मक्का की खेती से अगर किसान ज्यादा पैसा बचाना चाहते हैं, कम लागत में खेती करके अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो चलिए एक पुरानी विधि बताते हैं-
मक्का की खेती
मक्का की खेती में भी किसानों को अच्छी आमदनी होती है। मक्का की डिमांड कई चीजों में पहले से अधिक मांग हो गई है। लेकिन लागत अधिक होने के कारण किसानों को फायदा कम हो जाता है। मगर यहां पर आपको एक ऐसी विधि बताने जा रहे हैं जिससे मक्का की खेती में लागत घटा सकते हैं, दरअसल यहां पर बिहार के बांका जिले में अपनाई जाने वाली डिब्बलर विधि की बात की जा रही है।
जिसमें जैविक खाद का इस्तेमाल किया जाता है, और केमिकल खाद की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। साथ ही खेत की जुताई भी नहीं करनी पड़ती। इसलिए खेत तैयारी का भी खर्चा बच जाता है, तो चलिए आपको बताते हैं इस विधि से मक्का की खेती कैसे होती है।
मक्का की खेती डिब्बलर विधि से
डिब्बलर विधि से मक्का की खेती बिहार के बांका जिले के किसान कर रहे हैं। जिसमें वह खेत की जुताई नहीं करते हैं। बल्कि एक लकड़ी लेते हैं उसके सिरे पर एक लोहे का टुकड़ा बना रहता है, जो की जमीन में घुस आते हैं, और उस मक्का के दाने के साथ-साथ गोबर की पुरानी खाद डालते हैं। यहां पर वर्मी कंपोस्ट का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे खेत में छोटे-छोटे गड्ढे बनते हैं और उसमें खाद बीज एक साथ जाता है। जिससे अंकुरण अच्छे से होता है। इसमें रासायनिक खाद का खर्चा बच जाता है।
जैविक खाद भी बहुत ज्यादा नहीं लगती। वहीं खेत की तैयारी न होने से पिछली फसल का जो अवशेष रहता है वह मिट्टी को उपजाऊ बनता है इससे कई तरह के खर्चे किस बचा सकते हैं।

पारंपरिक विधि से इस विधि में है ज्यादा फायदा
पारंपरिक विधि में खर्च अधिक होता है। वही फायदा कम होता है, और इस डिब्बलर विधि से मक्का की खेती करेंगे तो अंकुरण 99% तक होगी। लेकिन पारंपरिक विधि में अंकुरण दर 70 से 75% तक ही देखने को मिलती है। इस विधि में सिंचाई की भी आवश्यकता कम होती है। इसलिए सिंचाई का भी पैसा किसान बचा सकते हैं। बताया जा रहा है कि कई किसान 10 साल से ज्यादा से इस विधि से खेती कर रहे हैं, और बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। जिससे इस विधि पर किसान भरोसा कर सकते हैं।
बिहार के बांका जिले में मक्का की खेती इस विधि से जोर-सोरो से हो रही है, और किसानों को इससे फायदा होता है। अन्य किसान भी वहां पर जाकर इस विधि के बारे में जानकारी ले सकते हैं। उन्हें यहां पर किसान सीखाते हैं, जिससे अन्य किसानों को भी इससे मदद हो सके।

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