धान की खेती करने वाले किसान अगर खेतों में काई को देखते हैं, तो चलिए बताते हैं इसके नुकसान क्या हैं और इससे फसल को बचाने के लिए क्या उपाय करने चाहिए।
धान के खेतों में काई के नुकसान
काई मुख्य तौर पर गहरे हरे रंग की होती है, जो उन जगहों में दिखाई देती है जहां लंबे समय तक पानी रुका रहता है और हल्की धूप मिलती है। इस समय धान के किसानों को खेतों में काई नजर आ रही होगी। काई एक जड़ रहित, छोटा सा हरे रंग का पौधा होता है। यह छायादार जगह में जल्दी पनप जाता है।
अगर धान के खेत में काई लगी है और वह बहुत ही पतली परत के रूप में है, तो किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। यह मिट्टी को ठंडा रखेगी। लेकिन जब यह परत मोटी हो जाती है, तो कई नुकसान होते हैं। सबसे बड़ा नुकसान यही है कि उत्पादन घट जाता है, क्योंकि यह काई की मोटी परत धान की जड़ों तक धूप, खाद, पानी और पोषक तत्व पहुंचाने में बाधा डालती है। इससे फसल अच्छी नहीं होती। किसान चाहे कितना भी खाद और समय पर पानी दें, इसका असर कम हो जाता है।
धान की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और कल्ले (Tillers) की संख्या भी घट जाती है। पौधे तिरछे होने लगते हैं, बालियों की संख्या कम हो जाती है। पानी में प्रदूषण फैलता है और बीमारियां भी फैल सकती हैं। यानी कि यह गंभीर समस्या है।

धान के खेत से काई कैसे हटाएं
किसान भाइयों, चिंता करने की जरूरत नहीं है। अगर धान के खेत में काई बहुत ज्यादा है, मोटी परत जमी हुई है तो ऐसे में कॉपर सल्फेट 500 ग्राम (Copper Sulphate) का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे रेत में मिलाकर खेत में डाला जाता है। इससे काई की समस्या खत्म हो जाती है। पौधे ज्यादा मजबूत बनते हैं और अच्छा उत्पादन मिलता है।
कॉपर सल्फेट क्या है? इसके फायदे जानिए
कॉपर सल्फेट को तूतिया भी कहा जाता है। यह एक कवकनाशी (Fungicide) होता है, जो फफूंद जनित रोगों से फसल को बचाता है। इससे फसल स्वस्थ रहती है और कई तरह की बीमारियां भी नहीं लगतीं।
इसका इस्तेमाल केवल धान के खेत में ही नहीं, बल्कि फल, सब्जियों और अन्य सजावटी पौधों के लिए भी किया जाता है। यह पौधों को कीटों से बचाता है। साथ ही इसका इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में कीटों और खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए भी किया जाता है।
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