अगर किसान गेहूं–चना की खेती समय पर नहीं कर पाए हैं, तो वे कम समय में तैयार होने वाली जौ की खेती कर सकते हैं। यह फसल कम लागत में तैयार हो जाती है और अच्छी कमाई का अवसर देती है। आइए जानते हैं जौ की खेती के फायदे, उन्नत किस्में और बुवाई की सही विधि।
जौ की खेती के फायदे
किसान रबी सीजन की मुख्य फसलें, जैसे गेहूं–चना नहीं लगा पाए हैं, उनके लिए जौ की खेती एक अच्छा विकल्प है। यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और इसकी लागत भी कम होती है। बताया जाता है कि जौ की खेती में गेहूं की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम लागत आती है। जौ की बाजार में अच्छी मांग है। इससे दलिया, पशु आहार और अन्य औद्योगिक उत्पाद बनाए जाते हैं। इसकी खेती से प्रति बीघा 7 से 10 क्विंटल तक उत्पादन लिया जा सकता है।
जिन क्षेत्रों में पानी की समस्या है, वहां भी जौ की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है, क्योंकि इसमें अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। पशु चारे और औद्योगिक उपयोग में भी इसका व्यापक इस्तेमाल होता है।
जौ की उन्नत किस्में
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जौ की उन्नत किस्में RD-2715, RD-2794 और RD-2660 हैं। किसान इन किस्मों की खेती कर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। जौ की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी, हल्की मिट्टी और मध्यम काली मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।
जौ की बुवाई दिसंबर के पहले सप्ताह से जनवरी के मध्य तक की जा सकती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शरद ऋतु में जितनी जल्दी हो सके बुवाई कर देनी चाहिए, ताकि फूल आने के समय अधिक गर्मी का असर न पड़े।
जौ के बीजों की बुवाई कैसे करें
यदि बुवाई सीड ड्रिल मशीन से की जाए तो प्रति हेक्टेयर लगभग 75 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। वहीं छिड़काव विधि से बुवाई करने पर प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज लगता है। सीड ड्रिल से बुवाई करना बेहतर होता है, क्योंकि इससे लागत कम आती है और बीज सही गहराई पर गिरते हैं। बीजों की बुवाई 1 से 1.5 इंच गहराई में करनी चाहिए।
जौ की खेती में सिंचाई और खाद प्रबंधन
जौ की खेती में गेहूं की तुलना में कम सिंचाई की जरूरत होती है। पहली सिंचाई बुवाई के 20–25 दिन बाद, दूसरी सिंचाईफूल या दाना बनते समय, तीसरी सिंचाई बालियां निकलते समय कर सकते है। खाद प्रबंधन की बात करें तो बुवाई के समय फास्फोरस और पोटाश देना चाहिए। पहली सिंचाई के साथ नाइट्रोजन देने से उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रोजन देर से देने पर दाने में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है।
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