MP की महिला किसानों को जैविक सब्जी उत्पादन और नर्सरी प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे वे कम लागत में अच्छी कीमत मिलने वाली खेती कर पाएंगी।
MP की महिला किसान जैविक खेती से बढ़ाएंगी आमदनी
देशभर में इस समय जैविक खेती का डंका बज रहा है। मध्य प्रदेश की महिलाओं को भी अब जैविक खेती की तरफ आकर्षित किया जा रहा है। जैविक खेती करने से मिट्टी उपजाऊ बनती है, पर्यावरण और स्वास्थ्य सुरक्षित रहते हैं, रासायनिक खाद व दवाओं का इस्तेमाल नहीं होता, जिससे खर्च भी कम होता है और अनाज सेहत के लिए फायदेमंद बनता है।
जैविक उत्पाद की मांग लगातार बढ़ रही है। इसकी कीमत रासायनिक उत्पादों से ज्यादा मिलती है। जैविक तरीके से उगाई गई सब्जियों का स्वाद अच्छा होता है और उपभोक्ता बार-बार इन्हें खरीदना पसंद करते हैं। सरकार भी जैविक उत्पादों की मार्केटिंग और बिक्री में किसानों की मदद कर रही है।
जैविक सब्जी उत्पादन और नर्सरी प्रबंधन का प्रशिक्षण
मध्य प्रदेश के कटनी जिले में महिलाओं को जैविक सब्जी उत्पादन और नर्सरी प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्रशिक्षण से महिलाओं को जैविक खेती के बारे में जड़ से जानकारी दी जा रही है।
उन्हें जैविक और रासायनिक खेती में अंतर बताया जा रहा है, साथ ही इसके फायदे और नुकसान समझाए जा रहे हैं। इसमें पौधों को जरूरी 17 पोषक तत्वों की जानकारी, उनका वर्गीकरण, खेती में आने वाली चुनौतियां, कीट व रोग नियंत्रण के जैविक उपाय आदि के बारे में विस्तार से बताया गया।
यह प्रशिक्षण 12 दिन का रहा, जिसमें जनपद पंचायत बड़वारा के गांव बसारी की स्वयं सहायता समूह से जुड़ी 35 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया। इसका उद्देश्य महिलाओं को स्वावलंबी बनाना और स्वरोजगार स्थापित करने में मदद करना है।
गाय का गोबर और गोमूत्र खेती में देंगे मदद
मध्य प्रदेश में गाय पालन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। गाय का पालन आसानी से कम खर्च में किया जा सकता है और गाय का गोबर व गोमूत्र खेती में बेहद उपयोगी होते हैं। जिसमें प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि एक ग्राम गोबर में लगभग 300 से 500 करोड़ तक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं। इसके अलावा गोमूत्र में करीब 33 प्रकार के तत्व मौजूद होते हैं। ये दोनों ही चीजें फसल के लिए अत्यंत फायदेमंद हैं।
गोमूत्र से बीज उपचार और पौधों को पोषण देने जैसे कई कार्य किए जा सकते हैं। इस बारे में भी विस्तृत जानकारी महिलाओं को दी गई, ताकि वे खेती में इसका सही उपयोग कर सकें।